मेरी ख़ामोशी ने जो लिखा,
वो कभी पढ़ न सके,
इश्क की बादल की सीढियाँ,
वो कभी चढ ना सके|
मेरे दर्द के आंसू को ,
वो खुशी के आंसू समझते रहे,
कुछ बातें अनकही होती हैं,
उन्हें कहें तो कैसे कहें|
पत्थर दिल पिघलाने को,
दो बूँद आंसू काफी हैं,
मेरे आंसूओं के शैलाब भी,
उनका 'नरम' दिल पिघला न सके|
मेरी ख़ामोशी न सुना,
पर इशारे भी तो नज़रंदाज़ किया,
नासमझ तो मैं था,
पर मेरी नासमझी वो समझ न सके!