Saturday, October 6, 2018

फिर मौसम का वो दौर है


लाल-पीले पत्तों से बना,
अब पेड़ों का सिरमौर है,
पथ पे पत्तों का कालीन बिछा,
फिर मौसम का वो दौर है !

अश्रु-सा एक-एक पत्ता गिर रहा,
मनो, वृक्षों के विरह का तौर है,
पंछी छोड़ जायेंगे अब बसेरा,
फिर मौसम का वो दौर है !

निहार लो कुदरत का नज़ारा,
वृक्ष विशाल फूल कुछ दिन और है,
बसंत तक ठूंठ कंकाल-सा रहेगा,
फिर मौसम का वह दौर है!

(c) Rohit Chandra

Saturday, October 14, 2017

कुदरत कविता लिखता है!

पतझड़ के पत्तों का प्रतिबिम्ब,
पानी में जो दीखता है,
क्या जाने किस कलम से,
कुदरत कविता लिखता है!

राही के राह-राह पर,
लाल-पीले पत्ते बिछा कर,
ऋतुराज, रमणीक रचना रचता है,
क्या जाने किस कलम से,
कुदरत कविता लिखता है!

पतझड़ यूँ तो, बसंत के अनुकूल है,
जहाँ सभी पेड़ विशाल फूल है,
पर पत्ता पथ पर जो गिर गया,
बसंत तक वृक्ष, विरह-वेदना करता है,
क्या जाने किस कलम से,
कुदरत कविता लिखता है!


(c) Rohit Chandra

Saturday, December 31, 2016

अब वह न गली है

अब वह न गली है, ना गुल है, ना गुलिस्तां हैं ,
जहाँ कभी हम तितलियों के पीछे भागते थे,
और छत्ता छेड़ते ही, तितैया हमें भगाते थे,
जहाँ धमाचौकड़ी कर, धूल-मिट्टी से ही नहाते थे,
अब वह न तरीका है, ना तितैया है, ना तितलियाँ हैं!
अब वह न बच्चे हैं, ना बारिश है, न बस्तियां हैं,
उस बारिश के बहती पानी में कागज़ि-कश्ती तैराते थे,
उस बस्ती के हमउम्र बच्चों के साथ दिनभर दौड़ लगाते थे,
जहाँ कभी कलम की स्याही से ही होली खेल जाते थे,
अब वह न कलम है, ना कागज़ है, ना कश्तियाँ हैं!
अब तो कंक्रीट-जंगल है, मायाजाल है, भागती जिन्दगियाँ हैं,
अब 'उन्नति' है पर मन उदास है, और फ़ोन पे दौड़ती उँगलियाँ हैं!

Sunday, June 29, 2014

अलविदा

फिर से चले हम गुलिस्ताँ छोड़ के,
मोह-माया रिश्तों की जंज़ीर तोड़ के,
पर याद आयेंगी दोस्तों के संग जमी महफिलें,
वो मस्ती भरे पल जाने फिर मिलें ना मिलें!
डर लगता है अलविदा कहने से,
रोकना जो पड़ता है अश्कों को बहने से!
फिर भी दोस्तों अलविदा कहता हूँ,
इस उम्मीद से आगे मैं चलता हूँ,
कि किसी रास्ते पे फिर मुलाकात होगी,
हँसेंगे हम मिल के, जब पुरानी बात होगी!

Thursday, January 6, 2011

आपकी चाहत

आपकी चाहत मेरा ख्वाब हो गया,
दिल जो कली था खिल के गुलाब हो गया!

जाने किस राह पे हम दिए चल,
जिंदगी में गया सब बदल -बदल!
आपके बारे में ही सोचूँ हरेक पल,
कभी कोई गीत, कोई शेर, कोई गज़ल!

आपके आने से,
इस प्यासे मन में तालाब हो गया,
आपकी चाहत मेरा ख्वाब हो गया!

सामने जब आप ना होतीं हैं ,
ढूंढती हैं ये निगाहें आपको,
मन में होती हैं आपकी तस्वीर,
वाह मेरी किस्मत, मेरी तकदीर!

आप जो मिले,
नीरस जीवन मद-मस्त हुआ, पानी शराब हो गया,
आपकी चाहत मेरा ख्वाब हो गया!

वाह! आपका सौंदर्य रूप,
जैसे हीरे पे गिरती धुप,
तेज ऐसी जल को जला दे,
वाणी ऐसे की काली को खिला दे!

पूछते थे इश्क क्या होता है,
आपकी आहट से ही जवाब हो गया,
आपकी चाहत मेरा ख्वाब हो गया!




Sunday, October 31, 2010

कहें तो कैसे कहें!

मेरी ख़ामोशी ने जो लिखा,
वो कभी पढ़ न सके,
इश्क की बादल की सीढियाँ,
वो कभी चढ ना सके|

मेरे दर्द के आंसू को ,
वो खुशी के आंसू समझते रहे,
कुछ बातें अनकही होती हैं,
उन्हें कहें तो कैसे कहें|

पत्थर दिल पिघलाने को,
दो बूँद आंसू काफी हैं,
मेरे आंसूओं के शैलाब भी,
उनका 'नरम' दिल पिघला न सके|

मेरी ख़ामोशी न सुना,
पर इशारे भी तो नज़रंदाज़ किया,
नासमझ तो मैं था,
पर मेरी नासमझी वो समझ न सके!