अब वह न गली है, ना गुल है, ना गुलिस्तां हैं ,
जहाँ कभी हम तितलियों के पीछे भागते थे,
और छत्ता छेड़ते ही, तितैया हमें भगाते थे,
जहाँ धमाचौकड़ी कर, धूल-मिट्टी से ही नहाते थे,
अब वह न तरीका है, ना तितैया है, ना तितलियाँ हैं!
जहाँ कभी हम तितलियों के पीछे भागते थे,
और छत्ता छेड़ते ही, तितैया हमें भगाते थे,
जहाँ धमाचौकड़ी कर, धूल-मिट्टी से ही नहाते थे,
अब वह न तरीका है, ना तितैया है, ना तितलियाँ हैं!
अब वह न बच्चे हैं, ना बारिश है, न बस्तियां हैं,
उस बारिश के बहती पानी में कागज़ि-कश्ती तैराते थे,
उस बस्ती के हमउम्र बच्चों के साथ दिनभर दौड़ लगाते थे,
जहाँ कभी कलम की स्याही से ही होली खेल जाते थे,
अब वह न कलम है, ना कागज़ है, ना कश्तियाँ हैं!
उस बारिश के बहती पानी में कागज़ि-कश्ती तैराते थे,
उस बस्ती के हमउम्र बच्चों के साथ दिनभर दौड़ लगाते थे,
जहाँ कभी कलम की स्याही से ही होली खेल जाते थे,
अब वह न कलम है, ना कागज़ है, ना कश्तियाँ हैं!
अब तो कंक्रीट-जंगल है, मायाजाल है, भागती जिन्दगियाँ हैं,
अब 'उन्नति' है पर मन उदास है, और फ़ोन पे दौड़ती उँगलियाँ हैं!
अब 'उन्नति' है पर मन उदास है, और फ़ोन पे दौड़ती उँगलियाँ हैं!
No comments:
Post a Comment