Saturday, October 6, 2018

फिर मौसम का वो दौर है


लाल-पीले पत्तों से बना,
अब पेड़ों का सिरमौर है,
पथ पे पत्तों का कालीन बिछा,
फिर मौसम का वो दौर है !

अश्रु-सा एक-एक पत्ता गिर रहा,
मनो, वृक्षों के विरह का तौर है,
पंछी छोड़ जायेंगे अब बसेरा,
फिर मौसम का वो दौर है !

निहार लो कुदरत का नज़ारा,
वृक्ष विशाल फूल कुछ दिन और है,
बसंत तक ठूंठ कंकाल-सा रहेगा,
फिर मौसम का वह दौर है!

(c) Rohit Chandra

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